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कैथोलिक विश्वासी महिमागान क्यों गाते हैं—लेकिन हर मिस्सा में क्यों नहीं गाते?

5 अक्टूबर 2026: अधिकांश कैथोलिक विश्वासी ‘महिमागान’ को हृदय से गा सकते हैं, फिर भी बहुत कम लोग रुककर यह सोचते हैं कि वे वास्तव में क्या प्रार्थना कर रहे हैं। यह प्राचीन स्तुति-गान मिस्सा में इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों रखता है—और ऐसा क्यों है कि जब भी कैथोलिक विश्वासी यूखरिस्त मनाने के लिए एकत्रित होते हैं, तब इसे हर बार नहीं गाया जाता?


क्या आप जानते हैं?

आज की तुलना में प्रारंभिक समय में महिमागान का प्रयोग इतनी बार नहीं किया जाता था।


प्रारंभिक धर्मविधिक स्रोतों से संकेत मिलता है कि यह स्तुति-गान सबसे पहले क्रिसमस के उत्सव से जुड़ा था और बाद में इसे रविवारों तथा प्रमुख पर्वों के अवसर पर भी गाया जाने लगा। हालांकि, कई शताब्दियों तक रोमन संस्कार में इसका प्रयोग मुख्यतः धर्माध्यक्षों तक सीमित था, जबकि याजक इसे केवल कुछ विशेष अवसरों पर ही गा सकते थे। समय के साथ कलीसिया ने इसके प्रयोग का विस्तार किया, क्योंकि इस प्राचीन स्तुति-गान के महत्व को और अधिक समझा जाने लगा।


महिमागान कहाँ से आया और हम वास्तव में क्या गा रहे हैं?

महिमागान मसीही आराधना की सबसे प्राचीन प्रार्थनाओं में से एक है। इसकी शुरुआत उन शब्दों से होती है जिन्हें यीशु के जन्म के समय स्वर्गदूतों ने गाया था:


“सर्वोच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा और पृथ्वी पर शांति, उन मनुष्यों को जिनसे वह प्रसन्न है।”


(लूकस 2:14)


समय के साथ कलीसिया ने इस बाइबिलीय स्तुति-गान का विस्तार करते हुए इसे एक गहन स्तुति-प्रार्थना का रूप दिया।


महिमागान तीन भागों में आगे बढ़ता है।


सबसे पहले हम पिता परमेश्वर की स्तुति करते हैं:


“हम आपकी स्तुति करते हैं, आपको धन्य कहते हैं, आपकी आराधना करते हैं, आपकी महिमा करते हैं और आपके प्रति धन्यवाद प्रकट करते हैं।”


ये बार-बार दोहराए जाने वाले शब्द केवल काव्यात्मक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं। वे हमें सिखाते हैं कि हमारी आराधना सबसे पहले इस बात के लिए है कि परमेश्वर कौन हैं, न कि केवल इसलिए कि हम उनसे अपनी आवश्यकताओं या इच्छाओं को पूरा करने के लिए कुछ माँगें।


इसके बाद प्रार्थना यीशु मसीह की ओर मुड़ती है। इसका सबसे लंबा भाग सीधे उन्हें संबोधित करता है—उन्हें “एकमात्र पुत्र” और “ईश्वर के मेमने, जो संसार के पाप हर लेते हैं” के रूप में संबोधित किया जाता है।


यहाँ कलीसिया मसीह के उद्धारकारी मिशन की घोषणा करती है और उनकी दया की याचना करती है।


अंत में, महिमागान मसीह की दिव्य महिमा की पुष्टि करते हुए पवित्र आत्मा का उल्लेख करता है:


“केवल आप ही पवित्र हैं, केवल आप ही प्रभु हैं... पवित्र आत्मा के साथ, पिता परमेश्वर की महिमा में।”


इस प्रकार महिमागान परम पवित्र त्रित्व—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा—की स्तुति का भजन बन जाता है।


प्रायश्चित्त की धर्मविधि के बाद महिमागान क्यों गाया जाता है?

महिमागान प्रायश्चित्त की धर्मविधि के बाद आता है, जिसमें विश्वासी अपने पापों को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर से दया की याचना करते हैं।


यह क्रम मसीही आराधना के बारे में एक महत्वपूर्ण बात प्रकट करता है। जब हम क्षमा की अपनी आवश्यकता को पहचान लेते हैं, तब कलीसिया निराशा में नहीं, बल्कि स्तुति के साथ उत्तर देती है। महिमागान हमारा ध्यान हमारी पापपूर्णता से हटाकर परमेश्वर की महानता और दया की ओर ले जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर का उद्धारकारी प्रेम हमारी असफलताओं से कहीं अधिक महान है।


इसी कारण महिमागान लंबे समय से आनंद और उत्सवपूर्ण समारोहों से जुड़ा रहा है।


हर मिस्सा में महिमागान क्यों नहीं गाया जाता?

महिमागान आगमन-काल और चालीसा-काल को छोड़कर रविवारों को गाया या पढ़ा जाता है, साथ ही महापर्वों और पर्वों के अवसर पर भी गाया जाता है। सामान्यतः सप्ताह के दिनों में इसे नहीं गाया जाता।


इसका अर्थ यह नहीं है कि सप्ताह के दिनों में मनाया जाने वाला मिस्सा कम महत्वपूर्ण है। बल्कि कलीसिया महिमागान को उन अवसरों के लिए सुरक्षित रखती है जिन्हें वह विशेष गंभीरता, आनंद और उत्सव के साथ मनाना चाहती है। रविवार, अर्थात् मसीह के पुनरुत्थान का दिन, कलीसिया के जीवन में विशेष स्थान रखता है। इसलिए वर्ष के अधिकांश समय रविवार के मिस्सा में महिमागान शामिल होता है।


सप्ताह के दिनों का मिस्सा सामान्यतः सरल रूप में मनाया जाता है, जब तक कि उस दिन कोई पर्व या महापर्व न हो। यदि कोई प्रमुख उत्सव, जैसे धन्य कुँवारी मरियम का स्वर्गारोपण, सभी संतों का पर्व या कोई अन्य महापर्व सप्ताह के किसी दिन पड़ता है, तो उस दिन महिमागान गाया जाता है।


महिमागान आगमन-काल और चालीसा-काल में भी नहीं गाया जाता, क्योंकि इन दोनों कालों का अपना विशेष आध्यात्मिक स्वरूप है।


आगमन-काल मसीह के आगमन की तैयारी का समय है, जबकि चालीसा-काल ईस्टर से पहले प्रायश्चित्त और मन-परिवर्तन का समय है। धर्मविधि के कुछ आनंदपूर्ण तत्वों को इन कालों में अलग रखकर कलीसिया हमारे भीतर प्रतीक्षा और अपेक्षा की भावना उत्पन्न करती है। जब क्रिसमस और ईस्टर पर महिमागान फिर से गूँजता है, तब उसके आनंदपूर्ण शब्द और भी अधिक गहरे अर्थ के साथ अनुभव किए जाते हैं।


क्या ‘महिमागान’ शब्द वाला कोई भी गीत मिस्सा में गाया जा सकता है?

नहीं।


महिमागान केवल परमेश्वर की महिमा के बारे में कोई भी गीत नहीं है। यह रोमन मिस्सल (Roman Missal) में दिया गया एक निश्चित धर्मविधिक पाठ है।


यद्यपि इसके लिए अलग-अलग संगीत-धुनों का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन महिमागान का स्वीकृत पाठ सुरक्षित रखा जाना चाहिए।


इसलिए गायक-मंडली महिमागान के स्थान पर कोई क्रिसमस गीत, स्तुति-आराधना का गीत या ऐसा कोई अन्य भजन नहीं रख सकती जिसमें केवल “महिमागान” शब्द आता हो।


यह अंतर धर्मविधि में महिमागान की अनोखी भूमिका को स्पष्ट करता है। महिमागान केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह मसीही विश्वासियों की अनेक पीढ़ियों से चली आ रही एक प्रार्थना है।


चाहे इसे किसी छोटे गाँव के गिरजाघर में गाया जाए या किसी भव्य कैथेड्रल में गायक-मंडली द्वारा—यह पूरे संसार के कैथोलिक विश्वासियों को उसी एक स्तुति-गान में एकजुट करता है, जिसकी शुरुआत बेथलेहेम के स्वर्गदूतों ने की थी।


“सर्वोच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा और पृथ्वी पर शांति!”


कैथोलिक कनेक्ट रिपोर्टर द्वारा

अनुवाद: सिस्टर एम. अल्फोंसा ग्रेशियन, एसआरए

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