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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बच्चों के यौन शोषण की शिकायत छिपाने पर स्कूल अधिकारियों पर होगी कार्रवाई

नई दिल्ली, 11 जुलाई, 2026: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी स्कूल अधिकारी को किसी बच्चे के साथ यौन शोषण की विश्वसनीय शिकायत मिलती है, तो वह पुलिस को इसकी सूचना देने से बच नहीं सकता। केवल अपनी ओर से जांच करके मामला बंद करना पॉक्सो कानून के तहत अपराध माना जा सकता है।


9 जुलाई को न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका (हेडमिस्ट्रेस) के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को फिर से शुरू करने का आदेश दिया। उन पर आरोप है कि उन्होंने 8 वर्षीय छात्रा द्वारा लगाए गए दुष्कर्म के आरोप की जानकारी पुलिस को नहीं दी।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 के अनुसार, यदि कोई बच्चा सीधे किसी जिम्मेदार व्यक्ति को अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी देता है, तो उस व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह तुरंत पुलिस या संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना दे। कानून निजी स्तर पर जांच करने की अनुमति नहीं देता।


यह मामला एक 8 वर्षीय बच्ची की मां द्वारा दायर अपील से जुड़ा है। आरोप है कि बच्ची के साथ कक्षा 8 के एक छात्र ने यौन शोषण किया था। बच्ची ने सबसे पहले अपनी बड़ी बहन, फिर एक दोस्त, स्कूल की हेड गर्ल और अंत में हेडमिस्ट्रेस को घटना की जानकारी दी।


आरोप है कि हेडमिस्ट्रेस ने पुलिस को सूचना देने के बजाय आरोपी छात्र से पूछताछ की, बच्ची से स्वयं सवाल किए, कुछ दिनों तक बच्चों पर नजर रखी और फिर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि "कुछ नहीं हुआ।" उन पर बच्चों को इस घटना के बारे में किसी से बात न करने के लिए कहने का भी आरोप है।


इससे पहले ट्रायल कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट ने स्कूल अधिकारियों को राहत देते हुए कहा था कि उनके पास अपराध की पर्याप्त जानकारी नहीं थी, क्योंकि उनकी आंतरिक जांच और मेडिकल जांच से यौन शोषण की पुष्टि नहीं हुई थी।


सुप्रीम कोर्ट ने इन फैसलों को पलटते हुए कहा कि निचली अदालतों ने शुरुआती चरण में ही बचाव पक्ष के साक्ष्यों का मूल्यांकन करके मानो पूरा मुकदमा चला दिया, जबकि इस स्तर पर केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।


अदालत ने कहा कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, इसलिए शिकायत मिलने पर पहले पुलिस को सूचना देना अनिवार्य है। यदि स्कूल या कोई अन्य संस्था स्वयं जांच करने लगे, तो इससे जांच में देरी हो सकती है, महत्वपूर्ण सबूत नष्ट हो सकते हैं और कानून का उद्देश्य विफल हो सकता है।


हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने केवल हेडमिस्ट्रेस के खिलाफ कार्यवाही बहाल की। अदालत ने प्रधानाचार्य, शिक्षकों और छात्रावास वार्डन को राहत दी क्योंकि उनके पास घटना की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी।


अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्ची की बड़ी बहन, उसकी दोस्त और स्कूल की हेड गर्ल उस समय नाबालिग थीं। इसलिए पॉक्सो अधिनियम की धारा 21(3) के तहत उन पर शिकायत न करने के लिए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।


यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में स्कूलों और अन्य संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे यौन शोषण की किसी भी विश्वसनीय शिकायत की तुरंत पुलिस को सूचना दें और स्वयं जांच करने की कोशिश न करें।


स्रोत: लाइव लॉ

अनुवाद : शिवराज बारा

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