- 14 July, 2026
नई दिल्ली, 11 जुलाई, 2026: कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने केंद्र सरकार से विदेशी अंशदान अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों को वापस लेने का आग्रह किया है। धर्माध्यक्षों का कहना है कि ये संशोधन देशभर में कार्यरत धर्मार्थ एवं मानवीय संस्थाओं के कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
10 जुलाई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सौंपे गए एक ज्ञापन में सीबीसीआई ने मणिपुर में जारी मानवीय संकट के समाधान के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की।
ज्ञापन में कहा गया है कि भारत में कैथोलिक कलीसिया सदियों से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक विकास, आपदा राहत, ग्रामीण विकास और जनजातीय कल्याण के क्षेत्रों में बिना किसी भेदभाव के राष्ट्र की सेवा करती रही है। सरकार की पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए भी सीबीसीआई ने चिंता व्यक्त की कि हाल के विधायी और प्रशासनिक कदम भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप तथा संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार को कमजोर कर रहे हैं।
एफसीआरए (संशोधन) विधेयक, 2026 तथा एफसीआरए (संशोधन) नियम, 2026 पर गंभीर आपत्ति जताते हुए धर्माध्यक्षों ने कहा कि इनमें शामिल कई प्रावधान उन पंजीकृत धर्मार्थ संस्थाओं को प्रभावित करेंगे जो समाज के वंचित एवं कमजोर वर्गों को आवश्यक सेवाएं प्रदान करती हैं। उनका कहना है कि ये प्रस्तावित संशोधन संविधान की करुणा, सामाजिक न्याय और लोककल्याण की भावना के विपरीत हैं। इसलिए उन्होंने सरकार से विधेयक और नियम दोनों को वापस लेने की मांग की।
सीबीसीआई ने सुझाव दिया कि भविष्य में यदि कोई संशोधन किया जाए तो उसे केवल भविष्य की परिस्थितियों पर लागू किया जाए तथा उसमें पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। सम्मेलन ने यह भी प्रस्ताव रखा कि अधिनियम के अंतर्गत मामलों का निर्णय संबंधित उच्च न्यायालयों की निगरानी में न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया जाए। इसके अतिरिक्त धर्मार्थ संपत्तियों के हस्तांतरण के लिए स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान, छोटे और गंभीर उल्लंघनों के बीच अंतर, दानदाताओं की मंशा की रक्षा, नियमों से "धर्म परिवर्तन शब्द को हटाने तथा मुख्य पदाधिकारी की परिभाषा को केवल ट्रस्टियों और शासी निकाय के सदस्यों तक सीमित रखने की भी सिफारिश की गई।
ज्ञापन में धार्मिक स्वतंत्रता तथा संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया कि विभिन्न राज्यों में बनाए गए धर्मांतरण विरोधी कानूनों के कारण ईसाइयों के विरुद्ध आरोपों, डराने-धमकाने और शत्रुतापूर्ण घटनाओं में वृद्धि हुई है।
धर्माध्यक्षों ने बताया कि धर्म की स्वतंत्रता से संबंधित कानूनों तथा ईसाई और मुस्लिम धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा न देने वाले संवैधानिक प्रावधान को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। उन्होंने सरकार से इन मामलों की शीघ्र सुनवाई और अंतिम निर्णय सुनिश्चित करने में सहयोग करने का आग्रह किया, ताकि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित हो सके।
मणिपुर की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए सीबीसीआई ने कहा कि वहां जारी हिंसा देश के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में से एक बन चुकी है। ज्ञापन के अनुसार हजारों किसान परिवार अपनी कृषि भूमि से विस्थापित हैं, बच्चों और युवाओं की शिक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हुई है तथा अनेक परिवार सुरक्षा और आजीविका की तलाश में अन्य राज्यों में पलायन करने को मजबूर हुए हैं। इसमें यह भी कहा गया कि बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों, पुरोहितों और धर्मसमर्पित व्यक्तियों को गहरे मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक आघात का सामना करना पड़ा है तथा हाल के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हुई है।
धर्माध्यक्षों ने गृह मंत्रालय से अपील की कि वह हिंसा प्रभावित राज्य में स्थायी शांति, सद्भाव और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए।
ज्ञापन के अंत में सीबीसीआई ने भारत की एकता, अखंडता और संविधान में निहित मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। साथ ही यह आश्वासन दिया कि कैथोलिक कलीसिया संविधान की भावना के अनुरूप शांति, मेल-मिलाप, मानवीय सहायता, सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में सरकार के साथ सहयोग करती रहेगी।
कैथोलिक कनेक्ट संवाददाता
अनुवाद: सिस्टर एम. अल्फों
सा ग्रेशियन, एसआरए
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