- 25 July, 2026
नई दिल्ली, 25 जुलाई, 2026: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक को लेकर कई सप्ताह से चल रहे छात्र विरोध प्रदर्शनों के बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है। इस घटनाक्रम ने सरकार पर बढ़ते जनदबाव को राजनीतिक रूप से निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है।
प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंपा और पूर्व में ट्विटर के नाम से जाने जाने वाले सोशल मीडिया मंच एक्स पर इसकी घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय एकता बनाए रखने और छात्रों को लगातार चल रहे विवादों से दूर रखते हुए अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देने के लिए यह निर्णय लिया है।
यह इस्तीफा सरकार और प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों के बीच होने वाली तीसरे दौर की वार्ता से पहले आया। इससे पहले राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (ऐं टी ए) के 47 अधिकारियों को भी बर्खास्त किया गया था। परीक्षा विवाद को लेकर एजेंसी लगातार कड़ी जांच के दायरे में रही है।
हजारों छात्र नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्र हुए थे, जहाँ उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (सी जे पी) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के तहत भूख हड़ताल, धरना और कैंडल मार्च आयोजित किए। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाना शामिल था।
सी जे पी के नेता अभिजीत डिपके ने इस इस्तीफे को लोकतंत्र और सामूहिक जनआंदोलन की जीत बताया। हालांकि, छात्र संगठनों ने कहा कि वे तब तक अपना आंदोलन जारी रखेंगे जब तक आगे के सुधार लागू नहीं किए जाते, जिनमें प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज पुलिस मामलों की वापसी और ऐं टी ए में संरचनात्मक बदलाव शामिल हैं।
अपने इस्तीफे के पत्र में प्रधान ने इस विवाद पर दुख व्यक्त किया, लेकिन यह भी कहा कि मुद्दा सामने आने के बाद से उन्होंने जिम्मेदारी के साथ कार्य किया है। उन्होंने अनियमितताओं से प्रभावित परीक्षाओं को रद्द करने, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सी बी आई) से जांच शुरू कराने और वर्ष 2027 से कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली लागू करने की सरकार की योजना का उल्लेख किया।
प्रधान ने यह भी दोहराया कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि जिसे उन्होंने "परीक्षा माफिया" कहा, उसके कारण छात्रों का शैक्षणिक और करियर संबंधी भविष्य प्रभावित न हो।
इस इस्तीफे पर राजनीतिक दलों और नागरिक समाज समूहों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। विपक्षी नेताओं ने कहा कि यह निर्णय बहुत पहले लिया जाना चाहिए था और आरोप लगाया कि सरकार ने छात्रों की चिंताओं पर तभी प्रतिक्रिया दी जब विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। वहीं, भाजपा नेताओं ने परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने के लिए सुधारों की आवश्यकता स्वीकार करते हुए प्रधान के कार्यकाल का बचाव किया।
भूख हड़ताल में शामिल रहे सोनम वांगचुक सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस इस्तीफे का स्वागत नैतिक जीत के रूप में किया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि भारत की परीक्षा प्रणाली से जुड़ी व्यापक संरचनात्मक समस्याएँ अब भी अनसुलझी हैं।
प्रधान के इस्तीफे ने ऐं टी ए की कार्यप्रणाली और भारत की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा को लेकर बहस को फिर से तेज कर दिया है। उच्च शिक्षा में प्रवेश और पेशेवर करियर के अवसरों के लिए करोड़ों छात्र इन परीक्षाओं पर निर्भर हैं, ऐसे में जनता का विश्वास पुनः स्थापित करना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी उजागर किया है कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलनों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इन विरोध प्रदर्शनों ने परीक्षा की निष्पक्षता, संस्थागत जवाबदेही और भारत के युवाओं के भविष्य को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
यद्यपि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा प्रदर्शनकारी छात्रों की तत्काल मांग को पूरा करता है, लेकिन सरकार की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि क्या वह विश्वसनीय और स्थायी सुधार लागू कर पाती है। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि यह इस्तीफा भारत की परीक्षा प्रणाली में एक निर्णायक मोड़ साबित होता है या फिर बढ़ते जनदबाव के प्रति केवल एक अस्थायी प्रतिक्रिया बनकर रह जाता है।
कैथोलिक कनेक्ट संवाददाता
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