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भारत में एक दशक में छात्र आत्महत्याओं में लगभग 80 प्रतिशत की वृद्धि, परीक्षा के दबाव को लेकर फिर बढ़ी चिंता

नई दिल्ली, 24 जुलाई, 2026: प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच भारत में बढ़ते छात्र आत्महत्या संकट ने एक बार फिर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में छात्र आत्महत्याओं में लगभग 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) से संकलित आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 से 2024 के बीच 1.23 लाख से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें से पाँचवें हिस्से से अधिक मामलों का संबंध कथित तौर पर परीक्षा में असफलता से था, जो युवाओं पर बढ़ते शैक्षणिक दबाव को उजागर करता है।


इन आँकड़ों ने भारत की शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में तत्काल सुधार, मानसिक स्वास्थ्य सहायता को मजबूत करने तथा शैक्षणिक चुनौतियों का सामना कर रहे छात्रों के प्रति अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की मांग को और तेज कर दिया है।


छात्र आत्महत्याओं में तेज़ वृद्धि

एनसीआरबी के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2014 में छात्र आत्महत्याओं की संख्या 8,000 से कुछ अधिक थी, जो वर्ष 2024 में बढ़कर 14,488 हो गई। इस प्रकार दस वर्षों में इसमें लगभग 80 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि इसी अवधि में देशभर में दर्ज कुल आत्महत्याओं की वृद्धि की तुलना में कहीं अधिक है।


औसतन हर वर्ष 2,000 से अधिक छात्र परीक्षा में असफल होने के बाद आत्महत्या कर लेते हैं, जबकि हजारों अन्य छात्र शैक्षणिक प्रदर्शन से जुड़ी गंभीर चिंता, अवसाद और भावनात्मक तनाव का सामना करते हैं।


मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट के लिए केवल परीक्षाओं को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अभिभावकों की अपेक्षाएँ, करियर को लेकर अनिश्चितता, आर्थिक दबाव और सीमित शैक्षणिक एवं रोजगार अवसरों के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा भी छात्रों पर बढ़ते मनोवैज्ञानिक बोझ के प्रमुख कारण हैं।


परीक्षा का दबाव बना बहस का विषय

ताज़ा आँकड़ों ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में कथित अनियमितताओं के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों के बीच इस मुद्दे पर फिर से ध्यान आकर्षित किया है।


इस आंदोलन ने यह चिंता सामने रखी है कि परीक्षा में असफलता, कथित प्रश्नपत्र लीक और बार-बार परीक्षाओं का रद्द होना छात्रों पर असाधारण मानसिक दबाव डाल सकता है, विशेषकर उन छात्रों पर जो अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिताते हैं।


हाल के महीनों में नीट अभ्यर्थियों से जुड़ी कई मौतों की खबरों ने परीक्षाओं को लेकर बनी अनिश्चितता के भावनात्मक प्रभाव को लेकर सार्वजनिक चिंता और बढ़ा दी है। हालांकि, व्यक्तिगत मामलों की जांच अभी जारी है, लेकिन कई परिवारों ने शैक्षणिक दबाव को एक महत्वपूर्ण कारण बताया है।


संकट केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा में असफलता अक्सर युवाओं को प्रभावित करने वाले व्यापक मानसिक स्वास्थ्य संकट का केवल एक हिस्सा होती है।


छात्रों पर परिवार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने, प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने और लगातार प्रतिस्पर्धी होते रोजगार बाजार में स्थिर नौकरी हासिल करने का बढ़ता दबाव है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामाजिक तुलना और शिक्षा के लिए परिवारों द्वारा किए गए आर्थिक त्याग भी भावनात्मक तनाव को बढ़ा सकते हैं।


विशेषज्ञों ने शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी पर भी चिंता व्यक्त की है। छात्र मानसिक स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय कार्यबल की अंतरिम रिपोर्ट में पाया गया कि अनेक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षित परामर्शदाताओं, आत्महत्या जोखिम मूल्यांकन तंत्र और नियमित मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों का अभाव है।


समय पर हस्तक्षेप और सुलभ सहायता के अभाव में चिंता या अवसाद से जूझ रहे छात्रों के लिए पेशेवर मदद लेना कठिन हो सकता है।


शिक्षा सुधार की फिर उठी मांग

इन विरोध प्रदर्शनों ने भारत की परीक्षा प्रणाली में सुधार पर बहस को भी फिर से तेज कर दिया है।


छात्र और अभियानकर्ता प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के संचालन में अधिक पारदर्शिता, प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए मजबूत सुरक्षा उपाय तथा शैक्षणिक अधिकारियों की अधिक जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।


केंद्र सरकार ने परीक्षा में होने वाली अनियमितताओं से निपटने के लिए कठोर कानून लाने की योजना की घोषणा की है। इसमें फास्ट-ट्रैक अदालतों और प्रश्नपत्र लीक में शामिल लोगों के लिए कड़ी सज़ा के प्रस्ताव शामिल हैं। सरकारी अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने के लिए व्यापक सुधारों पर विचार किया जा रहा है।


हालांकि, शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा सुधारों के साथ-साथ परामर्श सेवाओं, शिक्षक प्रशिक्षण और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों में अधिक निवेश भी आवश्यक है।


परिणामों से आगे बढ़कर छात्रों का समर्थन आवश्यक

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी युवा के मूल्यांकन का एकमात्र आधार उसकी शैक्षणिक उपलब्धि नहीं होनी चाहिए।


स्कूलों और विश्वविद्यालयों में सहयोगात्मक वातावरण, मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत तथा पेशेवर सहायता लेने से जुड़े सामाजिक कलंक को कम करने के प्रयासों को आगे की त्रासदियों को रोकने के लिए अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है।


अभिभावकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है कि वे भावनात्मक तनाव के संकेतों को पहचानें और अपने बच्चों को यह भरोसा दिलाएँ कि शैक्षणिक असफलताएँ और परीक्षा में विफलता उनके भविष्य का निर्धारण नहीं करतीं।


जब भारत अपनी परीक्षा प्रणाली में सुधारों पर विचार कर रहा है, तब छात्र आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या यह गंभीर याद दिलाती है कि शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ करुणा, भावनात्मक सहयोग और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा भी समान रूप से आवश्यक है।


नीतिनिर्माताओं, शिक्षकों और समाज के सामने चुनौती केवल अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली का निर्माण करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि शैक्षणिक दबाव के बोझ तले किसी भी युवा का जीवन न खो जाए।


सौजन्य : द हिन्दू

फोटो क्रेडिट : शशि शेखर कश्यप

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