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संत पापा लियो चौदहवें: शांति परमाणु हथियारों से नहीं, बल्कि निरस्त्रीकरण से स्थापित होती है

वेटिकन सिटी, 22 जुलाई, 2026: वेटिकन प्रकाशन संस्थान ने संत पापा लियो चौदहवें की नई पुस्तक "निःशस्त्र और निःशस्त्र करने वाला: शांति ईश्वर का उपहार है" प्रकाशित की है। अलेस्सांद्रो बान्फी द्वारा संपादित इस पुस्तक में 8 मई 2025 को संत पापा निर्वाचित होने के बाद से शांति पर दिए गए उनके भाषणों और चिंतन का संकलन है। यह पुस्तक फिलहाल इतालवी भाषा में प्रकाशित हुई है, जबकि इसका अंग्रेज़ी संस्करण शीघ्र प्रकाशित किया जाएगा। पुस्तक की शुरुआत पोप लियो चौदहवें द्वारा लिखी गई एक अप्रकाशित भूमिका से होती है।


संत पापा लियो चौदहवें लिखते हैं कि पुनर्जीवित प्रभु यीशु ने अपने प्रेरितों को सबसे पहले यही कहा था— "तुम्हें शांति मिले" (योहन 20:19)। उनके अनुसार, पुनरुत्थित मसीह ने अपने मित्रों और समस्त संसार को सबसे पहले शांति का उपहार दिया। किंतु यह उपहार बिना मूल्य के नहीं मिला, क्योंकि उनके महिमामय शरीर पर अब भी क्रूसारोपण और पीड़ा के घाव विद्यमान थे। घृणा, हिंसा और क्रूस की यातना सहने के बाद भी यीशु "निःशस्त्र और निःशस्त्र करने वाले" बनकर जी उठे। यही सुसमाचार का संदेश दो हजार वर्षों से मानव इतिहास में कार्य करता आ रहा है।


संत पापा लियो चौदहवें कहते हैं कि शांति आज भी मानव हृदय की सबसे गहरी आकांक्षा है, लेकिन वह निरंतर खतरे में है, उसका उल्लंघन किया जा रहा है और उसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। वे उल्लेख करते हैं कि वर्तमान में विश्व के लगभग 103 देश किसी न किसी प्रकार के युद्ध या संघर्ष से प्रभावित हैं। यूक्रेन, मध्य पूर्व, सूडान, म्यांमार, यमन, कांगो तथा अनेक अन्य क्षेत्रों में संघर्ष जारी हैं। संत पापा फ्राँसिस द्वारा वर्तमान परिस्थिति को "टुकड़ों में लड़ा जा रहा तीसरा विश्व युद्ध" कहे जाने का स्मरण करते हुए, पोप लियो इस पुस्तक में शांति से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डालते हैं।


वे लिखते हैं कि शांति सबसे पहले हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है। जब किसी विवाद, तनाव या अपमान के उत्तर में हमारा पहला कदम दूसरों को दोष देना, न्याय करना या उनकी निंदा करना होता है, तब उदासीनता धीरे-धीरे घृणा में बदल जाती है। इसके विपरीत, शांति की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति के हृदय से होती है। वे संत ऑगस्टीन के शब्द उद्धृत करते हैं: "समय कठिन है, समय दुःखद है, समय संकटपूर्ण है। अच्छा जीवन जियो, और तुम अपने जीवन से समय को बदल दोगे।"


संत पापा इस बात पर बल देते हैं कि यदि लोग अपने परिवारों, घरों, नगरों और कार्यस्थलों में शांति का अभ्यास नहीं करते, तो केवल विश्व नेताओं से शांति स्थापित करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, एक मुस्कान, क्षमा, और प्रेमपूर्ण शब्द जैसे छोटे-छोटे कार्य भी शांति की नींव रखते हैं।


वे आगे कहते हैं कि सच्ची शांति सत्य पर आधारित होती है। युद्ध करने वाले भी अक्सर दावा करते हैं कि वे शांति के नाम पर लड़ रहे हैं, क्योंकि कोई भी खुले रूप से यह स्वीकार नहीं करता कि वह केवल युद्ध चाहता है। वास्तव में हर व्यक्ति न्याय और शांति की आकांक्षा रखता है।


हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी का उल्लेख करते हुए संत पापा, संत जॉन पॉल द्वितीय के उस कथन को याद करते हैं कि युद्ध अब "ऐसा साहसिक कार्य बन गया है, जहाँ से लौटना संभव नहीं।" वे संत पॉल षष्ठम की संयुक्त राष्ट्र महासभा में की गई ऐतिहासिक अपील भी दोहराते हैं: "फिर कभी युद्ध नहीं, फिर कभी युद्ध नहीं! शांति ही समस्त मानवजाति और राष्ट्रों के भविष्य का मार्गदर्शन करे।"


संत पापा लियो कहते हैं कि विशेषकर परमाणु युग में यह स्वीकार करना आवश्यक है कि परमाणु हथियार नहीं, बल्कि निरस्त्रीकरण ही शांति की वास्तविक गारंटी है। उनके अनुसार, शीत युद्ध के दौरान यह समझ अधिक स्पष्ट थी, किंतु आज विश्व पुनः हथियारों की होड़ में प्रवेश कर चुका है, जिससे भय और असुरक्षा बढ़ रही है। वे अमेरिकी गायक बॉब डिलन की पंक्ति उद्धृत करते हैं: "मैं तुमसे घृणा करता हूँ क्योंकि तुम मनुष्य द्वारा बनाए गए, उसके स्वामित्व वाले और उसके नियंत्रण में हो।"


संत पापा लियो यह भी प्रश्न उठाते हैं कि "क्या मानव जाति को पृथ्वी पर इसी प्रकार बने रहना चाहिए?" उनका कहना है कि आधुनिक साइबर तकनीक और बढ़ते वैश्विक सैन्यीकरण के युग में यह प्रश्न पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गया है।


वे बताते हैं कि शांति केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यक्तिगत साक्ष्य और जीवन-गवाही से निर्मित होती है। वे धन्य फ्लोरिबर्ट ब्वाना चुई, परमेश्वर के सेवक जॉर्जियो ला पीरा और डोरोथी डे जैसे व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार का विरोध, गरीबों की सेवा और संवाद के माध्यम से शांति को बढ़ावा दिया। साथ ही वे उन अनगिनत सामान्य लोगों को भी याद करते हैं, जो अपनी अंतरात्मा के अनुसार जीवन जीकर शांति के गुमनाम दूत बने हुए हैं।


पोप सोवियत अधिकारी स्तानिस्लाव पेत्रोव का उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं। 26 सितंबर 1983 को मॉस्को के निकट एक सैन्य केंद्र में कार्यरत पेत्रोव को सूचना मिली कि अमेरिका से कई परमाणु मिसाइलें सोवियत संघ की ओर दागी गई हैं। बाद में यह चेतावनी तकनीकी त्रुटि सिद्ध हुई। पेत्रोव ने नियमों का अंधानुकरण करने के बजाय अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनी और संभावित परमाणु युद्ध को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पोप कहते हैं कि यदि मशीनों को यह निर्णय लेने दिया जाए कि कब निर्दोष लोगों पर बम गिराना है, तो वह मानवता के लिए अत्यंत भयावह स्थिति होगी। एक व्यक्ति की जागृत अंतरात्मा पूरे विश्व के बराबर मूल्य रखती है।


अंत में संत पापा लियो लिखते हैं कि शांति के लिए आशा आवश्यक है। चर्च सभी लोगों के प्रति प्रेम और करुणा का संदेश सुनाता रहेगा, क्योंकि आज का विश्व भविष्य के लिए शांति का संदेश खोज रहा है। वे लोगों से आग्रह करते हैं कि वे यीशु मसीह में ही सच्ची शांति का स्रोत खोजें। जैसा कि प्रभु कहते हैं: "मैं इसलिए आया हूँ कि वे जीवन पाएँ और परिपूर्ण जीवन पाएँ" (योहन 10:10)।


दुनिया में फैले युद्धों से निराश होने वालों के लिए संत पापा , संत पापा पायस ग्यारहवें के शब्द दोहराते हैं: "आइए, हम ईश्वर को धन्यवाद दें कि उसने हमें इन्हीं चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जीने का अवसर दिया है। अब किसी को भी साधारण या उदासीन बने रहने की अनुमति नहीं है।"


संत पापा अपनी भूमिका का समापन इस प्रार्थना के साथ करते हैं कि ईश्वर मानवता को अहिंसा और मेल-मिलाप के मार्ग पर चलाए। वे सभी विश्वासियों तथा सद्भावना रखने वाले लोगों से आग्रह करते हैं कि वे शांति को अपने जीवन का मिशन बनाएँ और विश्व में स्थायी शांति के निर्माण के लिए निरंतर कार्य करें।


सौजन्य: वेटिकन न्यूज़

अनुवाद: सिस्टर एम. अल्फोंसा ग्रेशियन, एसआरए

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