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ऐ आई सी यु ने महाराष्ट्र में धर्म परिवर्तन के बाद आदिवासी अधिकारों की समीक्षा करने वाली समिति पर चिंता जताई

नई दिल्ली, 20 जुलाई 2026: ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन ( ऐ आई सी यु) ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा धर्म परिवर्तन के संदर्भ में अनुसूचित जनजाति के अधिकारों और लाभों की समीक्षा के लिए गठित समिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि यह कदम आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर कर सकता है।


20 जुलाई को जारी एक बयान में कैथोलिक धर्मनिरपेक्ष संगठन ने कहा कि यह निर्णय हाल के राजनीतिक बयानों की पृष्ठभूमि में आया है, जिनमें धार्मिक आधार पर आदिवासी अधिकारों की समीक्षा की बात की जा रही है। इससे संविधान द्वारा आदिवासी समुदायों को दिए गए संरक्षण के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ी है।


ऐ आई सी यु का आरोप है कि आर ऐस ऐस - बी जे पि की विचारधारा से जुड़े संगठन वर्षों से आदिवासी समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने का प्रयास करते रहे हैं। संगठन के अनुसार, इन प्रयासों के तहत पारंपरिक सरना या प्रकृति-पूजक समुदाय, व्यापक हिंदू पहचान रखने वाले आदिवासी और पिछले लगभग 150 वर्षों में ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों के बीच भेद किया जा रहा है।


संगठन ने कहा कि देश के कई क्षेत्रों में रहने वाले ईसाई आदिवासियों को चर्च द्वारा स्थापित शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा संस्थानों से लाभ मिला है। ये संस्थान भारत के कई दूर-दराज़ और पिछड़े इलाकों में कार्य कर रहे हैं।


ऐ आई सी यु ने कहा कि शिक्षित ईसाई आदिवासियों ने जल, जंगल और जमीन से जुड़े संवैधानिक अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगठन के अनुसार, उन्होंने ठेकेदारों, राजनीतिक हितों और कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के खिलाफ आवाज़ उठाई है, ताकि आदिवासी समुदायों को उनका उचित अधिकार और लाभ मिल सके।


जेसुइट पुरोहित फादर स्टेन स्वामी का उल्लेख करते हुए संगठन ने कहा कि उनका "जीवन, कार्य और न्यायिक हिरासत में हुई मृत्यु न्याय और गरिमा के लिए चल रहे संघर्ष का प्रतीक है।"


ऐ आई सी यु ने यह भी कहा कि धर्म के आधार पर संवैधानिक अधिकारों को सीमित करने का एक ऐतिहासिक उदाहरण पहले भी मौजूद है। संगठन ने संविधान अनुसूचित जाति आदेश, 1950 का उल्लेख करते हुए कहा कि शुरुआत में अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदुओं तक सीमित था, जिसे बाद में सिखों और बौद्धों तक बढ़ाया गया, लेकिन ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों को इससे बाहर रखा गया। संगठन के अनुसार, इस नीति ने दलित समुदाय में लंबे समय से विभाजन और भेदभाव को बढ़ावा दिया है। ऐ आई सी यु ने चेतावनी दी कि यदि अनुसूचित जनजातियों के साथ भी ऐसा ही किया गया तो आदिवासी समाज में भी इसी प्रकार का अन्याय उत्पन्न हो सकता है।


ऐ आई सी यु के राष्ट्रीय अध्यक्ष एलियास वाज़ ने महाराष्ट्र सरकार से संविधान के समानता और भेदभाव-रहित सिद्धांतों का सम्मान करने की अपील की। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि आदिवासी समुदायों को धर्म के आधार पर विभाजित करने वाली नीतियों से बचाया जाए तथा आदिवासी कल्याण को न्याय, समावेशिता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के सिद्धांतों के आधार पर आगे बढ़ाया जाए, न कि वैचारिक आधार पर।


– कैथोलिक कनेक्ट रिपोर्टर

अनुवाद : शिवराज बारा

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