- 02 April, 2026
2 अप्रैल, 2026: धार्मिक स्वतंत्रता को मजबूत करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि लोग अपने घर में प्रार्थना सभा कर सकते हैं और इसके लिए किसी भी तरह की पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, जब तक कोई कानून नहीं तोड़ा जा रहा हो।
यह फैसला एक रिट याचिका पर आया, जिसे कुछ ईसाई परिवारों ने दायर किया था। उन्होंने पुलिस द्वारा दिए गए उन नोटिसों को रद्द करने की मांग की थी, जिनमें उन्हें अपने घर में प्रार्थना करने से रोका गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और बिना वजह दखल दिया जा रहा है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी को अपने घर में प्रार्थना करने से रोकता हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक सब कुछ कानून के दायरे में हो रहा है, तब तक अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।
कोर्ट ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता 2016 से अपनी खुद की जमीन पर बने घर में प्रार्थना सभा कर रहे हैं। इन सभाओं से कभी कोई परेशानी या गैरकानूनी काम की शिकायत नहीं आई, इसलिए पुलिस का हस्तक्षेप सही नहीं था।
याचिकाकर्ताओं के वकील प्रीतम सिंह ने कहा कि थाना प्रभारी बार-बार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 94 के तहत नोटिस भेज रहे थे, जिससे उनकी धार्मिक गतिविधियों में बाधा आ रही थी, जबकि शांति भंग की कोई शिकायत नहीं थी।
राज्य की ओर से वकील शोभित मिश्रा ने अधिकारियों के कदम का बचाव किया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर कहीं शोर-शराबा हो या कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो, तो अधिकारी कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन यह कार्रवाई असली समस्या के आधार पर ही होनी चाहिए।
अंत में कोर्ट ने पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिया कि वे लोगों के कानूनी और धार्मिक अधिकारों में बेवजह दखल न दें और नोटिसों को रद्द कर दिया, जिससे याचिकाकर्ताओं को राहत मिली।
इस फैसले को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की एक मजबूत पुष्टि माना जा रहा है, खासकर घर में प्रार्थना करने के मामले में। साथ ही यह भी साफ करता है कि ऐसे मामलों में प्रशासन कितनी सीमा तक हस्तक्षेप कर सकता है I
सौजन्य: द वर्डिक्टम
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