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महाराष्ट्र में प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून पर चर्च ने जताई गहरी चिंता

मुंबई, जुलाई 11, 2025: महाराष्ट्र में प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून को लेकर कैथोलिक चर्च ने गहरी आपत्ति जताई है और इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा बताया है। 11 जुलाई को बॉम्बे महाधर्मप्रांत द्वारा जारी एक बयान में, चर्च लीडरों ने चिंता व्यक्त की कि यह कानून स्वैच्छिक धार्मिक रूपांतरणों को अपराध की श्रेणी में ला सकता है और अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से उन ईसाइयों को निशाना बना सकता है जो राज्यभर में हाशिए पर मौजूद समुदायों की सेवा करते हैं।


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बॉम्बे महाधर्मप्रांत के प्रवक्ता फादर नाइजेल बैरेट ने कैथोलिक कनेक्ट से बातचीत में कहा कि चर्च का प्राथमिक प्रयास यह है कि वह प्रस्तावित कानून को लेकर विधायकों से संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जाए।

“हम महाराष्ट्र विधानसभा से आग्रह करते हैं कि वे ईसाई समुदाय की भावनाओं और मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अंतरधार्मिक सौहार्द पर होने वाले इसके प्रभावों पर गंभीरता से विचार करें,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी कहा कि चर्च शांतिपूर्ण और वैधानिक समाधान को प्राथमिकता देता है, लेकिन यदि यह कानून संवैधानिक स्वतंत्रताओं के लिए खतरा बना, तो चर्च कानूनी मार्ग अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा।


फादर बैरेट ने आगे कहा, “यदि यह प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून वर्तमान स्वरूप में पारित होता है और हमारे पास कोई और विकल्प नहीं बचता, तो महाधर्मप्रांत इसे अदालत में चुनौती देने के लिए मजबूर हो सकता है।” उन्होंने इस कदम को “अंतिम उपाय” करार दिया।


महाराष्ट्र राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने 9 जुलाई को विधानसभा में इस प्रस्तावित कानून की घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य कथित धर्मांतरणों को रोकना है, खासकर आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों में। यदि यह कानून पारित होता है, तो महाराष्ट्र ऐसा कानून लागू करने वाला भारत का 13वां राज्य बन जाएगा।


विधायकों को संबोधित करते हुए बावनकुले ने कहा था, “राज्य में धार्मिक रूपांतरण को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया जाएगा।” उन्होंने यह भी बताया कि वे इस विषय पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से परामर्श करेंगे। यह कदम बीजेपी विधायक गोपीचंद पडालकर के उस आरोप के बाद उठाया गया है जिसमें उन्होंने कहा कि ईसाई मिशनरी आदिवासियों और गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण करवा रहे हैं। पडालकर ने यह भी मांग की थी कि 150 से अधिक “अवैध चर्चों” को ध्वस्त किया जाए, जो कथित तौर पर गांव और सरकारी ज़मीन पर बने हैं।


बावनकुले ने कहा कि उन्होंने आदिवासी बहुल धुले-नंदुरबार क्षेत्र में बने इन कथित अवैध चर्चों की जांच के आदेश दे दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ये संरचनाएं अवैध पाई गईं, तो संबंधित अधिकारियों द्वारा इन्हें छह महीनों के भीतर गिरा दिया जाएगा।


इसके जवाब में, बॉम्बे महाधर्मप्रांत ने 11 जुलाई को एक औपचारिक प्रेस वक्तव्य जारी किया, जिसमें इस प्रस्तावित कानून पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। राज्य की कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी को मानते हुए भी महाधर्मप्रांत ने चेतावनी दी कि स्वैच्छिक धार्मिक रूपांतरणों को अपराध घोषित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होगा, जो धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। महाधर्मप्रांत ने यह भी स्पष्ट किया कि कैथोलिक चर्च जबरन धर्मांतरण का विरोध करता है और वह शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और जनकल्याण के माध्यम से हाशिए पर मौजूद समुदायों की सेवा करते हुए वैधानिक सीमाओं के भीतर ही कार्य करता है।


यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के श्री ए.सी. माइकल ने कहा कि महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ बीजेपी “वोट बैंक की राजनीति” कर रही है और इस प्रस्तावित कानून के जरिए एक हिंदुत्व एजेंडा आगे बढ़ा रही है। “आज तक भारत की किसी भी अदालत में जबरन धर्मांतरण का एक भी ठोस प्रमाण या सज़ा नहीं हुई है,” उन्होंने कहा।


गौरतलब है कि महाराष्ट्र की 12.65 करोड़ आबादी में ईसाई केवल 0.96 प्रतिशत हैं, जबकि भारत की कुल 1.4 अरब जनसंख्या में उनकी भागीदारी 2.3 प्रतिशत है। ईसाई लीडरों ने चेतावनी दी है कि इतने छोटे अल्पसंख्यक को निशाना बनाना न केवल भेदभाव को बढ़ावा देगा, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी परंपरा को भी कमजोर करेगा।


रिपोर्टर: कैथोलिक कनेक्ट


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